कला से आप क्या समझते हैं ? कला का अर्थ एवं परिभाषा बताइए !

कला एक अत्यन्त व्यापक शब्द है। प्राचीन काल भारतीय भाषाओं में कला एवं शिल्प शब्द का प्रयोग हो रहा है। अंग्रेजी भाषा में ART का प्रयोग तेरहवीं शताब्दी से प्रारम्भ हुआ, जिसका अर्थ बनाना, उत्पन्न करना या ठीक करना है।

प्रारम्भ में इसके स्थान पर कौशल शब्द का प्रयोग किया जाता था और शारीरिक या मानसिक कौशल का प्रयोग करके जब किसी कार्य में कृत्रिम निर्माण किया जाय तो वह कला माना जाता था। भरत मुनि के नाट्यशास्त्र में कला शब्द का प्रयोग लगभग ललित कला के स्थान पर किया गया है। भरत मुनि के नाट्य शास्त्र से पूर्व शिल्प शब्द का प्रयोग ही कला के स्थान पर प्रचलित था।

कला की परिभाषाएँ

विद्वानों द्वारा समय समय पर कला की अनेक परिभाषायें की गई है। उनमें से कुछ हम यहाँ दे रहे हैं।

“वस्तु का रूप सुन्दर बनाने वाली विशेषता ही कला है।” -शिवसूत्र-विमर्शिणी

“कला में मनुष्य अपनी अभिव्यक्ति करता है।” -डॉ. भोला शंकर तिवारी

ईश्वर की कर्तव्य शक्ति का संकुचित रूप जो हमको भाव-बोध के लिये मिलता है कला हैं।” -जयशंकर प्रसाद (काव्य और कला)

कला एक क्रिया है

प्रकृति, प्रति क्षण विभिन्न क्रियाएँ करती हैं। चन्द्रमा का घटना-बढ़ना, पुष्प का खिलना, इन्द्र धनुष का निर्माण। मानव भी अनेक क्रियाएँ करता है जिनमें से कुछ विशेष कार्य जो कुशलता पूर्वक किये जाते हैं दूसरों को आकर्षित करते हैं। इसका स्पष्ट अर्थ यह हुआ कि कला एक व्यापक शब्द है जिसका प्रयोग प्रकृति तथा मानव जीवन के विविध क्षेत्रों में होता है। किन्तु प्रकृति तो ईश्वरीय कला है जो मानवीय क्रियाओं से पृथक है जबकि मानव द्वारा निर्मित कलात्मक वस्तु या चित्र के निर्माण एक रचना प्रक्रिया होती है जो उसकी कलात्मकता को निश्चित करती है तो इस विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि “कला वह मानवीय क्रिया है जिसका विशेष लक्षण, ध्यान से देखना, गणना अथवा संकलन, मनन, चिन्तन एवं स्पष्ट रूप से प्रकट करना है।”

कला एक तकनीक है

किसी भी कलाकृति को बनाने के लिये उसके निर्माण में प्रयुक्त सामग्री एवं उस सामग्री के प्रयोग की तकनीक समझना अनिवार्य है। बिना उस तकनीक को समझे उस कलाकृति का निर्माण सम्भव ही नहीं है। जितना बेहतर हमें सामग्री के इस्तेमाल की तकनीक का ज्ञान होगा
उतनी ही कुशलता से हम उसका प्रयोग कर पायेंगे और उतनी ही उत्कृष्ट वह कलाकृति होगी। अत: यह स्पष्ट होता है कि “कला एक विशेष तकनीकी क्रिया है कि जिसमें कलाकृति के निर्माण हेतु प्रयुक्त सामग्री की प्रयोगविधि को समझना अनिवार्य है।”

कला एक शिल्प है

भरतमुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में चित्रकला को एवं एक अन्य विद्वान रचित “कौशीत की ब्राह्मण” नामक ग्रन्थ में नृत्य एवं गीत को शिल्प की संज्ञा दी गई है।

किसी भी सामग्री को काट-छांट कर उसे कोई रूप देना शिल्प कहलाता है इस कारण चाहे वह मूर्तिकला हो या वास्तु शिल्प, धातु शिल्प हो या वस्त्र शिल्प अथवा प्लास्टिक आर्ट सभी शिल्प की श्रेणी के अन्तर्गत आते हैं।

उपर्युक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि “प्रत्येक प्रकार की कला के लिये किसी न किसी सामग्री को काट-छांट कर या तराश कर ही उसे कलाकृति का रूप दिया जा सकता है। कलाकृति निर्माण हेतु उसके लिये उपयुक्त सामग्री को काटते-छांटने या तराशने की क्रिया एवं उसकी कुशलता अनिवार्य है।”

कला एक कौशल है

हमारे प्राचीन संस्कृत ग्रन्थ “ऐतरेय ब्राह्मण” में कहा गया है कि कोई भी कृति तभी कलाकृति कही जा सकती है जब वह विशेष कौशल द्वारा तैयार की गई हो तथा उसमें छन्द लयात्मक व्यवस्था हो।

क्रिया, शिल्प एवं तकनीक के अतिरिक्त कलाकार की मानसिक चिन्तन प्रक्रिया उस कृति को आकर्षक बनाने एवं उसमें नवीनता लाने की अनेक युक्तियाँ खोजती हैं, इसे ही कलाकार का कौशल कहा जाता है। इस प्रकार स्पष्ट होता है कि “कलाकृति को प्रभावशाली, नवीन एवं आकर्षक बनाने हेतु मानसिक चिन्तन-मनन एक अनिवार्य प्रक्रिया है।”

कला एक ज्ञान है

हमारे प्राचीन भारतीय वांगमय में चौसठ कलाओं का वर्णन है। इन कलाओं का ज्ञान उच्चतम ज्ञान से भिन्न प्रक्रिया मानी गई। ज्ञान वास्तव में एक विशिष्ट मानसिक प्रक्रिया है। अगर उसे पूर्व विश्लेषित कर समझा नहीं गया तो उसका ज्ञान होगा ही नहीं और ज्ञान नहीं हुआ तो उस तकनीक का प्रयोग ही सम्भव नहीं है। मन और मस्तिष्क जब किसी भी तकनीक, वस्तु, घटना, क्रिया आदि को पूर्ण विश्लेषित कर सत्य मान लेता है तभी वह उस तकनीक वस्तु, घटना अथवा क्रिया आदि का ज्ञान प्राप्त कर सकता है।

इस विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि कलाकृति निर्माण से पूर्व उसमें प्रयुक्त तकनीक, सामग्री आदि का पूर्ण ज्ञान अनिवार्य है।

कला एक अनुकृति है

प्लेटो ने कहा है, “कला सत्य की अनुकृति की अनुकृति है।”

सत्य तो केवल ईश्वर है। यह प्रकृति या सृष्टि उसकी अनुकृति है और कलाकार इस सृष्टि की ही अनुकृति करता है।

अनुकृति का अर्थ है- सादृश्य। इस प्रकार स्पष्ट होता है कि “किसी कलाकृति की श्रेष्ठता इस पर निर्भर करती है कि मूल कृति चाहे वह ईश्वरीय हो या मानव रचित, उससे उस कलाकृति का कितना साम्य है।

कला एक कल्पना है

बुद्ध घोष के अनुसार, “संसार भर की जितनी कलाकृतियाँ हैं सब कल्पना की उपज हैं। “प्लेटो भी यही मानता है कि कलाकृति में दैवीय प्रेरणा की ही भूमिका होती है। कलाकार अनेक ऐसे काल्पनिक चित्रों या मूर्तियों का निर्माण करता है जिनका अस्तित्व ही संसार में नहीं होता। देवता ईश्वरीय अवतार, राक्षस, स्वर्ग, ये सब कल्पना ही तो हैं। यूरोपीय विद्वान भी यही मानते थे कि कलाकार नवीन कलाकृतियों का सृजन करके अपनी कल्पना को स्पष्ट करता है। उपर्युक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि “कल्पना का आधार भी सांसारिक वस्तुयें ही होती हैं। कलाकार कल्पना में उन्हें ही पुनः संयोजित कर नवीन रूप देता है।”

कला एक अभिव्यक्ति है

विद्वानों का कथन है कि कला एक प्रकार की भावपूर्ण भाषा है जो किसी मानसिक स्थिति को जगाने में सफल होती है। लियोनार्दो द विन्सी का कथन है कि कलाकार जिन आकृतियों की रचना करता है, वे उसके आन्तरिक भावों पर आधारित होती हैं। अर्थात् कला के रूपों में कलाकार के मन के भावों की अभिव्यक्ति होती है।

जिस प्रकार हम भाषा को माध्यम बनाकर अपने विचार दूसरों तक पहुँचाते हैं उसी प्रकार कलाकृति के द्वारा भी कलाकार अपने मन के विचारों को सम्प्रेषित करता है। कला एक प्रकार की भावपूर्ण भाषा है जो कलाकृतियों में अभिव्यक्त होती है। कला को कुछ विद्वानों ने सामाजिक स्वप्न कहा है।

अतः स्पष्ट है कि “कला चाहे काल्पनिक हो या वास्तविक वस्तु का सादृश्य, उसके पीछे कलाकार की भावनाओं की अभिव्यक्ति ही मूल भूमिका का निर्वाह करती है।

कला एक क्रीड़ा है

विभिन्न विद्वानों ने कला को एक क्रीड़ा की संज्ञा दी है। स्वतंत्र अभिव्यक्ति के सभी रूपों को मानवशास्त्री क्रीड़ा से सम्बद्ध मानते हैं। हवर्ट रीड का मत है कि जब हमारी अनेक इच्छायें, विचार अनुभूतियाँ और संवेदन तुरन्त अभिव्यक्त नहीं हो पाते तो तनाव उत्पन्न करते हैं। क्रीड़ा से इन्हें मुक्त होने का अवसर मिलता है। कला में भी तो यही प्रक्रिया होती है। अन्य विद्वानों का कथन है कि कला क्रीड़ा से कुछ अधिक है। क्रीड़ा से केवल मनोरंजन होता है जबकि कला में विचार महत्त्वपूर्ण होता है। क्रीड़ा में तात्कालिक आनन्द होता है जबकि कला स्थायी आनन्द देती है।

अत: यह स्पष्ट होता है कि “कलाकार अपनी संवेदनाओं एवं तनावों को मुक्त करने के लिये भी कला को माध्यम बनाता है और कला उसे स्वस्थ मानसिक जगत में ले जाती है।

निष्कर्ष

उपर्युक्त विवरण के आधार पर हम कह सकते हैं कि कला एक संलिष्ट प्रस्तुति है जिसमें तकनीक की जानकारी एवं उसको हृदयंगम करना, कल्पनाशीलता एवं सृष्टि में उपलब्ध वस्तुओं की अभिव्यक्ति, सौन्दर्य बोध चिन्तन, नवीनता एवं कलाकार का स्वयं का व्यक्तित्व एक रचना धर्मिता की बहुत बड़ी भूमिका रहती है।

• कला एक सहज संयमित क्रिया है और प्रकृति की स्वाभाविक लगने वाली मगर यंत्रवत् क्रिया से भिन्न है।

• कला समाज के उन्नयन हेतु एक उपयोगी एवं सशक्त माध्यम है।

• कला हमारे चारों ओर के वातावरण तथा वस्तुओं को प्रभावित करती है।

• रचना की क्रिया के अनुसार ही कृति का नामकरण किया जाता है। काष्ठ से बनी कलाकृति को काष्ठ कला का नाम दिया जायेगा और वही कलाकृति यदि पीतल से बनी है तो उसे धातु कला का नाम दिया जायेगा।

• कला अनुकृति एवं कल्पना का संगम है।

• चिंतन एवं अनुभव कला को उत्कृष्ट रूप प्रदान करता है।

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